कुरुक्षेत्र | लेखक: गजेंद्र कुमार भोला
फैंख दिया गाण्डीव धरा पर ।
आहत हो, मोह बाणो से ।।
कैसे युद्ध करू हे- केशव ।
अपने प्रतिबिम्ब वालों से ।।
बन्धु, गुरु, पितामह सम्मुख।
कैसे इन पर प्रहार करूँ ।।
अपनों का कैसे रुधिर बहाउ ।
क्यू बाणो की बौछार करूँ ।।
देख अर्जुन के व्याकुल मन को ।
केशव ने रथ रोक दिया।।
निज स्वरूप प्रकट कर अपना ।
धनुर्धर को उपदेश दिया ।।
हे- कुंती पुत्र इस महासमर में ।
जो सम्मिलित रिश्ते-नाते हैं ।।
ये समय-समय पर वस्त्र बदल कर ।
निज रूप नया धर आते हैं ।।
आत्मतत्व ये शाश्वत सत्य है ।
आभा से मण्डित होता हैं ।।
चाहे शास्त्रों से प्रहार करो ।
ये नहीं विखंडित होता है ।।
मोह. पाश से बँधा हुआ मन ।
झूठे रिश्तों में खोता ।।
प्राण-तत्व का प्यारा सम्बंध ।
प्राण पति से ही होता।।
अगर शोक तु, तन का करता।
ये यही पड़ा रहा जाता है ।।
अगर मोह प्राणों से करता ।
प्राण अमर वर पाता हैं ।।
दूर क्षीतिज अम्बर में बैठा ।
सबको राह दिखाता हूँ ।।
पाप-पुण्य को तोल तुला पर ।
अमरत - विष चखवाता हूँ ।।
दोष नहीं लगता उस वध का ।
जो होते अत्याचारी है ।।
छिन्नभिन्न करते निज अंग को।
जो विषधर से विषकारी हैं ।।
तू साधक मैं आराध्य तुम्हारा।
युद्ध तो एक बहाना है ।।
जितनी क्षति हुई धर्म की ।
उतना धर्म बढाना हैं ।।
उठो धनुर्धर शर चाप चढ़ाओ ।
छल कपट, दंभ पर संधान करो ।।
रण-पथ पर पग धरते - धरते ।
स्व-कर्तव्य का सम्मान करो ।।
फेंक दिए फिर मोह बाणो के।
अन्याय अधर्म पर प्रहार किया ।।
फैराहकर के विजय पताका ।
कुरुक्षेत्र को शान्त किया ।।
लेखक: गजेंद्र कुमार भोला
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