संवाद: आत्मा और कर्म का सत्य
जीवन में हम अक्सर बाहरी दुनिया में उलझे रहते हैं, लेकिन जब कभी हम अपने अंतर्मन में झांकते हैं, तो कई प्रश्न जन्म लेते हैं। इस सुंदर काव्य संवाद में एक तोता और एक जिज्ञासु आत्मा के बीच हुई वार्ता को प्रस्तुत किया गया है। तोता सिर्फ़ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे भीतर की वह चेतना है, जो हमें बार-बार याद दिलाती है कि यह संसार और यह शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर और अविनाशी।
आइए पढ़ते हैं गजेन्द्र कुमार जी द्वारा रचित यह अद्भुत संवाद:
अंतह मन के आँगन में मैं |
जब भी खेलन जाता हूँ ||
पिंजरे वाले तोते से मैं |
बातें खूब बनाता हूँ ||
एक दिन पूछा तोतें से यह |
पिंजरे मैं कैसे आया ||
स्वच्छंद लोक विचरण करता |
फिर पिंजरा ये कैसे भाया ||
यक्षी प्रश्न सुनकर तोता |
मंद-मंद कुछ मुस्काया ||
भंग मौनता कर उसने |
मेरी जिज्ञासा को समझाया ||
ईश्वर अंश जीव अविनाशी |
मै सर्वज्ञ अन्तर्यामी ||
पिंजरा तो तेरे कर्मो का फल |
मै तो हूँ घट-घट वासी ||
ना तो पिंजरा मेरा है ये |
ना तेरी कंचन काया ||
प्रारब्ध में जो किये कर्म थे |
उन्हें भोगने तू आया ||
जब-जब आतां नूतन तन में |
तब-तब मैं समझाता हूँ ||
पिंजरे वाले तोते से मै |
बातें खूब बनाता हूँ ||
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