बेटियाँ: बदलते भारत की नई पहचान | लेखक: गजेंद्र कुमार भोला

 

शीर्षक: बेटियाँ: शक्ति, संवेदना और सम्मान की प्रतीक
लेखक: गजेंद्र कुमार भोला

जो देश था वर्षों पुराना |
देश अब बदल रहा ||
योगदान से वो बेटियों के |
भारत महान बन रहा ||

चाहे रास्ता दुर्गम, कठिन हो |
वहाँ पहुँचती हैं बेटियाँ ||
हिन्द की आवाज़ |
बुलंद कर रही हैं बेटियाँ ||

खेत हो, खलियान हो |
पहाड़ या मैदान हो ||
दूर अंतरिक्ष शटल |
या कोई चंद्रयान हो ||

जीत हर सोपान |
आसमाँ छू रही हैं बेटियाँ ||
देश की मुस्कान देखो |
बन रही हैं बेटियाँ ||

सरहद हो, चाहे देश की |
या खेल का मैदान हो ||
देश की हो बागडोर |
या फाइटर विमान हो ||

शौर्य की, कमान से |
लक्ष्य भेदती हैं बेटियाँ ||
एवरेस्ट की भी चोटियों को |
चूमती हैं बेटियाँ ||

कुरीतियों की चकियाँ में |
शैल पुत्री पिस रही ||
खिली नहीं थी, जो कली |
वो गर्भ में कुचल रही ||

चाहत में बेटों के |
बलिदान होती बेटियाँ ||
शक्ति और लक्ष्मी का |
वरदान होती बेटियाँ ||

माँ-बाप गेंद बनते जब |
परिवार के मैदान में ||
ठोकरे खाते सुनहरे |
सपनों के मकान में ||

आँखों से छलके, मोतियों को |
बीनती हैं बेटियाँ ||
बीमार हों, लाचार |
रोटी सेकती हैं बेटियाँ ||

कुछ रास्ते काँटे भरे |
बेटियाँ मर्म को तुम जान लो ||
स्वर्ण का या चर्म का |
छली मृग को पहचान लो ||

कई मारीच छदम घूमते |
कुछ अनजान रहती बेटियाँ ||
माँ-बाप की थी शान |
क्यूँ गुमनाम होती बेटियाँ ||


निष्कर्ष:
बेटियाँ अब केवल सहनशीलता की नहीं, बल्कि सफलता की प्रतीक बन चुकी हैं। वे हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही हैं—फिर चाहे वह विज्ञान हो, खेल हो, रक्षा क्षेत्र हो या घर की ज़िम्मेदारी। समाज को चाहिए कि वह उनके योगदान को सम्मान दे, और उन्हें आगे बढ़ने के लिए समान अवसर प्रदान करे। बेटियाँ अब कमज़ोरी नहीं, देश की शक्ति हैं। 

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